नमस्कार CTET Aspirants,
CDP की तैयारी में आज हम एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत, लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) का नैतिक विकास का सिद्धांत पढ़ेंगे। यह सिद्धांत बच्चों के उस सोच पर आधारित है कि वे सही और गलत का फैसला कैसे लेते हैं।
कोहलबर्ग ने लोगों से 'हिन्ज़ की दुविधा' (Heinz Dilemma) जैसी कहानियाँ सुनाकर उनके नैतिक तर्क को समझा। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि नैतिक विकास तीन स्तरों (Levels) और छह अवस्थाओं (Stages) में होता है।
1. कोहलबर्ग के नैतिक विकास के 3 स्तर (Levels)
कोहलबर्ग के अनुसार, नैतिक विकास में व्यक्ति एक स्तर से दूसरे स्तर तक क्रम से आगे बढ़ता है।
Level 1: पूर्व-पारंपरिक स्तर (Pre-Conventional Level) (4-10 वर्ष)
इस स्तर पर नैतिकता का कोई आंतरिक बोध नहीं होता। बच्चा सिर्फ सजा से बचने और पुरस्कार पाने के लिए नियम मानता है।
Level 2: पारंपरिक स्तर (Conventional Level) (10-13 वर्ष)
इस स्तर पर नैतिकता का आधार समाज के नियम और कानून होते हैं। बच्चा 'अच्छा नागरिक' बनने के लिए नियमों का पालन करता है।
Level 3: उत्तर-पारंपरिक स्तर (Post-Conventional Level) (13 वर्ष से ऊपर)
इस स्तर पर नैतिकता व्यक्तिगत सिद्धांतों और विवेक पर आधारित होती है। व्यक्ति कानून को भी चुनौती दे सकता है यदि वह मानवता के सिद्धांतों के खिलाफ हो।
2. 6 अवस्थाएँ (Stages)
प्रत्येक स्तर को दो अवस्थाओं में बाँटा गया है:
| Level | Stage | कीवर्ड (Keywords for CTET) |
| पूर्व-पारंपरिक | Stage 1: दंड एवं आज्ञाकारिता | डर, सजा से बचना (Punishment) |
| पूर्व-पारंपरिक | Stage 2: स्वार्थ एवं विनिमय | पुरस्कार, 'जैसे को तैसा' (Exchange/Tit for Tat) |
| पारंपरिक | Stage 3: अच्छा लड़का / अच्छी लड़की | प्रशंसा, दूसरों की नज़रों में अच्छा दिखना (Approval) |
| पारंपरिक | Stage 4: कानून एवं व्यवस्था | कर्तव्य पालन, समाज की व्यवस्था बनाए रखना (Law & Order) |
| उत्तर-पारंपरिक | Stage 5: सामाजिक अनुबंध | बहुमत का हित, कानून में सुधार की संभावना (Social Contract) |
| उत्तर-पारंपरिक | Stage 6: सार्वभौमिक सिद्धांत | विवेक, मानवता के सिद्धांत (Conscience/Universal Principle) |
कक्षा में अनुप्रयोग (Application in Classroom)
शिक्षक के रूप में, आपको कक्षा में ऐसे वातावरण बनाने चाहिए जहाँ बच्चे खुलकर नैतिक दुविधाओं पर चर्चा कर सकें (Moral Reasoning)। बच्चों को हमेशा सजा का डर दिखाकर नहीं, बल्कि उनके तर्क को विकसित करके सिखाना चाहिए।
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