NCERT Solution Class 9 Hindi Ganga Chapter 2 क्या लिखूँ

NCERT Solution Class 9 Hindi Ganga Chapter 2 क्या लिखूँ

CBSE Class 9 Hindi Chapter 2 Kya Likhu (क्या लिखूँ) Question Answers from Ganga Book

Class 9 Hindi Ganga Book Chapter 2 “क्या लिखूँ” एक रोचक निबंध है जिसमें लेखक ने निबंध-लेखन की कठिनाइयों, “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” कहावत और समाज-सुधार जैसे विषयों पर विचार प्रस्तुत किए हैं। यहाँ आपको इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर सरल भाषा में मिलेंगे, जो परीक्षा की तैयारी में बहुत मदद करेंगे।

📖 अध्याय एक नज़र में

  • पाठ का नाम: क्या लिखूँ
  • लेखक: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
  • विधा: निबंध
  • मुख्य विषय: निबंध लेखन, समाज-सुधार, दूर के ढोल सुहावने होते हैं
  • परीक्षा में महत्वपूर्ण: लेखक के विचार, गार्डिनर के विचार, समाज-सुधार की अवधारणा

 

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

1. "हैट टॉगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है... असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।" निबंध में 'हैट' और 'खूँटी' का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है?

(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना

(ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना

(ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना

(घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना

उत्तरः (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना

तर्कः यहाँ 'हैट' मुख्य विचार (भाव) का प्रतीक है और 'खूँटी' केवल सहारा (विषय) है। लेखक बताना चाहता है कि निबंध में विषय से अधिक लेखक के विचार और भाव महत्वपूर्ण होते हैं।

2. "उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है... उसका उल्लास रहता है।" मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?

(क) शैली और स्पष्ट सहज भाषा को महत्व न देना

(ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना

(ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना

(घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना

उत्तरः (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना

तर्कः मोंटेन की पद्धति में लेखक अपने अनुभव और भावनाओं के आधार पर स्वतंत्र रूप से लिखता है। इसलिए लेखक इसी शैली को अपनाने का निर्णय लेता है।

📚 Chapter 2 Complete Study Material

क्या लिखूँ Summary

क्या लिखूँ Question Answers

क्या लिखूँ MCQ 

क्या लिखूँ  Quiz

क्या लिखूँ KWL Chart

क्या लिखूँ Concept Map

क्या लिखूँ Lesson Plan

3. "तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल... वृद्धों के लिए अतीत सुखद..." यह तुलना किस पर आधारित है?

(क) तर्क और भावना

(ख) ज्ञान और शिक्षा

(ग) परिश्रम और उपलब्धि

(घ) अभिलाषा और अनुभव

उत्तरः (घ) अभिलाषा और अनुभव

तर्कः तरुणों का भविष्य के प्रति आकर्षण उनकी अभिलाषा (इच्छा) को दर्शाता है, जबकि वृद्धों का अतीत के प्रति लगाव उनके अनुभव पर आधारित होता है।

4. निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?

(क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए

(ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए

(ग) ढोल के महत्व को दर्शाने के लिए

(घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में

उत्तरः (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए

तर्कः अमीर खुसरो का उदाहरण यह दिखाने के लिए दिया गया है कि वे एक ही रचना में कई विषयों को जोड़ सकते थे। लेखक भी उसी तरह दोनों विषयों को एक साथ लिखता है।

5. निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?

(क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।

(ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं।

(ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं।

(घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।

उत्तरः (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।

तर्कः निबंध में बताया गया है कि समाज में हमेशा कुछ न कुछ कमियाँ रहती हैं, इसलिए हर युग में सुधार की आवश्यकता बनी रहती है।

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

1. निबंध लेखन के विषय में ए. जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?

उत्तरः ए.जी. गार्डिनर का मानना है कि निबंध लिखने के लिए एक विशेष 'मानसिक आवेग' या भीतरी उत्साह होना चाहिए। उनके अनुसार, विषय कोई भी हो (जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी), यदि मन में भाव हैं, तो निबंध लिखा जा सकता है। वहीं, लेखक (पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी) का अनुभव थोड़ा अलग है। लेखक के अनुसार, कभी-कभी विषय इतने कठिन या विपरीत होते हैं कि भीतरी उत्साह होने के बावजूद सामग्री और समय के अभाव में आदर्श निबंध लिखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। गार्डिनर 'भाव' को प्रधानता देते हैं, जबकि लेखक 'विषय की प्रकृति' और 'परिस्थितियों' को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

2. लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तरः लेखक के अनुसार, दोनों वर्तमान से दुखी हैं लेकिन उनके दृष्टिकोण अलग हैं:

वृद्धों की असंतुष्टिः वृद्धों को अपना 'अतीत' (बीता हुआ समय) गौरवशाली और सुखद लगता है। वे वर्तमान के परिवर्तनों को स्वीकार नहीं कर पाते और पुराने मूल्यों को खोता देख दुखी होते हैं। उनके लिए "बीता हुआ समय ही श्रेष्ठ था"।

तरुणों (युवाओं) की असंतुष्टिः युवाओं को अपना 'भविष्य' सुनहरा दिखाई देता है। वे वर्तमान की रूढ़ियों और बाधाओं को तोड़कर जल्द से जल्द अपने सपनों के भविष्य में पहुँचना चाहते हैं। वर्तमान की धीमी गति उन्हें बेचैन करती है।

📚 Next Chapter

✔️ पाठ 3 संवादहीन – सारांश

✔️ पाठ 3 संवादहीन – MCQs 

 ✔️ पाठ 3 संवादहीन – KWL Chart

✔️ पाठ 3 संवादहीन – Concept Map 

✔️ पाठ 3 संवादहीन – प्रश्न-उत्तर 

 ✔️ पाठ 3 संवादहीन – Interactive Quiz

✔️ पाठ 3 संवादहीन – Lesson Plan

3. नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आई?

उत्तरः नमिता 'समाज-सुधार' पर और अमिता 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' विषय पर निबंध लिखवाना चाहती हैं।

लेखक को हुई कठिनाइयाँ:

समय का अभावः उन्हें बहुत कम समय में दो अलग-अलग विषयों पर लिखना था।

सामग्री की कमीः 'समाज-सुधार' जैसे गंभीर विषय के लिए उनके पास न तो कोई पुस्तकालय था, न ही आँकड़े।

विरोधाभासः 'दूर के ढोल सुहावने' एक मुहावरा है जिसे सीमित शब्दों में स्पष्ट करना और उसे 'आदर्श' बनाना कठिन था।

4. निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?

उत्तरः

निबंधशास्त्र के आचार्यों के अनुसार आदर्श निबंध लिखने के लिए-

  • निबंध संक्षिप्त, स्पष्ट और प्रभावी होना चाहिए।
  • उसमें सामग्री (विचार) और शैली (प्रस्तुति) दोनों का संतुलन होना चाहिए।
  • विषय से संबंधित उचित सामग्री एकत्र करनी चाहिए।
  • लिखने से पहले रूपरेखा (outline) बनानी चाहिए।
  • भाषा सरल, सहज और समझने योग्य होनी चाहिए।
  • निबंध में एकता और क्रमबद्धता होनी चाहिए।

निबंध लिखने से पहले मेरी तैयारी -

  • सबसे पहले विषय को ध्यान से समझता/समझती हूँ।
  • उससे संबंधित मुख्य बिंदु लिखकर रूपरेखा बनाता/बनाती हूँ।
  • विषय पर अपने विचार और अनुभव सोचता/सोचती हूँ।
  • निबंध को भूमिका, मुख्य भाग और निष्कर्ष में बाँटता/बाँटती हूँ।
  • अंत में निबंध को पढ़कर त्रुटियों को सुधारता /सुधारती हूँ।

5. मानटेन ने "जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।" निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?

उत्तरः मानटेन का मानना था कि जो कुछ स्वयं देखा, सुना या भोगा है, वही सच्चा साहित्य है। निबंध लेखन में इसकी उपयोगिता यह है:

मौलिकताः जब हम अपने 'अनुभव' लिखते हैं, तो वे किसी की नकल नहीं होते।

सजीवताः अनुभव से लिखा गया निबंध पाठक के हृदय को छूता है क्योंकि उसमें सच्चाई होती है।

आत्मपरक शैली: देखने और सुनने से हमारे पास विचारों का भंडार जमा हो जाता है, जिससे निबंध 'बोझिल' न होकर 'रोचक' बन जाता है।

विधा से संवाद

निबंध लिखने की कला

'निबंध' का शाब्दिक अर्थ है- 'बाँधना' (निबंध), अर्थात भली-भाँति बँधा या गढ़ा हुआ। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार, दृष्टिकोण और भावनाओं को तार्किक, भावनात्मक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप से प्रस्तुत करते हैं।

शैली का अर्थ अभिव्यक्ति का ढंग होता है। निबंधकार विभिन्न प्रकार से विषय को प्रस्तुत करता है। इस पाठ में निबंध लेखन की प्रक्रियाओं के विषय में चर्चा की गई है। दिए गए आरेख को देखिए और इसके आधार पर एक निबंध लिखिए। अगर आपको निबंध लेखन का कोई और ढंग बेहतर लगता है तो उसे ऐसे ही आरेख से दर्शाइए और बताइए कि आपको वह ढंग क्यों बेहतर लगता है?

उत्तरः 'निबंध' शब्द का अर्थ है 'भली-भाँति बँधा हुआ', अर्थात ऐसा लेखन जिसमें विचारों को क्रमबद्ध और सुसंगठित रूप में प्रस्तुत किया जाए। निबंध लेखन एक कला है, जिसमें लेखक अपने विचारों, अनुभवों और भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। दिए गए आरेख के आधार पर निबंध लेखन की प्रक्रिया को निम्न प्रकार समझा जा सकता है-

सबसे पहले प्रेरणा की आवश्यकता होती है। जब मन में किसी विषय के प्रति रुचि या उत्साह उत्पन्न होता है, तभी लेखन की शुरुआत होती है। इसके बाद विषय चयन किया जाता है। विषय ऐसा होना चाहिए जिसे लेखक समझता हो और जिस पर वह अपने विचार स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सके।

विषय चुनने के बाद सामग्री संग्रह किया जाता है। इसमें लेखक अपने अनुभव, ज्ञान, पढ़ी हुई बातें तथा अन्य स्रोतों से जानकारी एकत्र करता है। इसके बाद रूपरेखा निर्माण होता है, जिसमें निबंध के मुख्य बिंदुओं को क्रम से लिखा जाता है ताकि लेखन व्यवस्थित रहे।

अगला चरण है शैली निर्धारण। इसमें यह तय किया जाता है कि भाषा कैसी हो- सरल, प्रभावी और रोचक। शैली ही निबंध को आकर्षक बनाती है। अंत में लेखन और समापन होता है, जहाँ लेखक अपने विचारों को पूर्ण रूप से प्रस्तुत करता है और एक उचित निष्कर्ष देता है।

* मेरा विचार (अन्य ढंग)

मेरे अनुसार निबंध लेखन का एक और बेहतर ढंग हो सकता है-

कारणः

अनुभव विचार रूपरेखा लेखन

संशोधन

इसमें पहले अपने अनुभव और विचारों पर ध्यान दिया जाता है, जिससे निबंध अधिक सजीव बनता है।

अंत में संशोधन (revision) जोड़ने से त्रुटियाँ सुधरती हैं और निबंध अधिक प्रभावी हो जाता है।

यह प्रक्रिया सरल और व्यावहारिक है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयोगी है।

भाव-विस्तार

"तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक"

यदि उपर्युक्त वाक्य का भाव विस्तार किया जाए तो कहा जा सकता है कि युवा पीढ़ी में किसी समस्या को लेकर आक्रोश की भावना प्रबल होती है। वह किसी भी समस्या के समाधान के लिए बैठकर बातचीत करने के बजाय उस पर त्वरित निर्णय लेना चाहते हैं, जबकि वृद्ध पीढ़ी किसी समस्या के समाधान के लिए अनुभव और परंपरागत ढंग पर विश्वास करती है।

पाठ में से चुनकर कुछ ऐसे और वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों का अपने शब्दों में भाव-विस्तार कीजिए-

"जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।"

उत्तरः इस पंक्ति का अर्थ है कि जब तक युवा व्यक्ति जीवन की वास्तविक कठिनाइयों, संघर्षों और जिम्मेदारियों के मैदान में नहीं उतरता, तब तक उसे यह दुनिया बहुत रंगीन और आसान लगती है। उसे लगता है कि संसार में सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार होगा। लेकिन जैसे ही वह 'जीवन-संग्राम' यानी आजीविका कमाने और व्यावहारिक समस्याओं का सामना करने उतरता है, उसे संसार की कठोर वास्तविकता का पता चलता है। कल्पना और वास्तविकता के बीच का यही अंतर उसे शुरू में संसार को 'मनमोहक' समझने पर मजबूर करता है।

"मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।"

उत्तरः परिवर्तन संसार का नियम है। समय के साथ समाज में कुछ कुरीतियाँ या ऐसी परंपराएँ जन्म ले लेती हैं जो उस काल के लिए अनुपयुक्त हो जाती हैं। लेखक का मानना है कि 'सुधार' एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। आदि काल से लेकर आधुनिक काल तक, हर युग में मनीषियों और समाज-सुधारकों ने अपने समय की बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि कोई समाज पूर्णतः दोषमुक्त हो जाए; इसलिए सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।

"आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।"

उत्तरः यह वाक्य जीवन के चक्र और पीढ़ियों के बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है। आज का युवा जो वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट है और क्रांति की बातें करता है, समय बीतने पर जब वह स्वयं वृद्ध होगा, तब उसे अपना यही समय वर्तमान) 'सुनहरा अतीत' लगने लगेगा। उम्र के साथ व्यक्ति का उत्साह कम होने लगता है और वह अपनी युवावस्था की यादों और परंपराओं को सुरक्षित रखने की कोशिश करने लगता है। जो आज बदलाव चाहता है, कल वही पुरानी यादों का संरक्षक बन जाता है।

"निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है।"

उत्तरः यहाँ लेखक ने निबंध की प्रभावशीलता पर बल दिया है। एक छोटा निबंध गागर में सागर भरने के समान होता है। जब कोई रचना छोटी और सुगठित होती है, तो लेखक अपने विचारों को बिना भटकाव के स्पष्टता से रख पाता है। पाठक भी कम समय में लेखक के मुख्य संदेश को गहराई से समझ सकता है। अधिक विस्तार कभी-कभी विषय को उबाऊ बना देता है और मूल बिंदु कहीं खो जाता है, जबकि संक्षिप्तता निबंध को मारक और प्रभावशाली बनाती है।

मेरा अनुभव

इस निबंध में लेखक को दो विषयों ("दूर के ढोल सुहावने होते हैं" और "समाज-सुधार") पर निबंध लिखने थे। पिछली कक्षाओं में आपने भी बहुत से विषयों पर अनुच्छेद, संवाद और निबंध लिखे हैं। आपको किन विषयों पर लिखना सरल या कठिन लगा और क्यों?

उत्तरः मुझे "प्रकृति", "मेरा प्रिय मित्र", "मेरा विद्यालय" जैसे विषयों पर लिखना सरल लगता है, क्योंकि ये विषय मेरे दैनिक जीवन और अनुभवों से जुड़े होते हैं। इन पर लिखते समय मुझे अपने विचार आसानी से याद आ जाते हैं और मैं उन्हें सरल भाषा में व्यक्त कर पाता/पाती हूँ।

इसके विपरीत, "समाज-सुधार", "विज्ञान के लाभ-हानि", "पर्यावरण संरक्षण" जैसे विषय थोड़े कठिन लगते हैं, क्योंकि इन पर लिखने के लिए अधिक जानकारी, सोच-विचार और उदाहरणों की आवश्यकता होती है। इन विषयों में सही तर्क और क्रमबद्धता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण होता है।

विषयों से संवाद

1. निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।

उत्तरः महान व्यक्तियों के कार्य (संक्षेप में)

गौतम बुद्ध :- इन्होंने अहिंसा, करुणा और मध्यम मार्ग का उपदेश दिया। समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध किया।

महावीर स्वामी : इन्होंने सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह का संदेश दिया। जीवों के प्रति दया और संयमपूर्ण जीवन पर बल दिया।

नागार्जुन :- इन्होंने बौद्ध दर्शन को सरल और तार्किक रूप में समझाया तथा ज्ञान और चिंतन को बढ़ावा दिया।

आदि शंकराचार्य : इन्होंने अद्वैत वेदांत का प्रचार किया और समाज में धार्मिक एकता तथा आध्यात्मिक जागरूकता लाई।

कबीर :- इन्होंने जाति-पाँति, पाखंड और अंधविश्वास का विरोध किया तथा सादगी और सच्चाई का संदेश दिया।

गुरु नानक :- इन्होंने समानता, भाईचारे और ईश्वर की एकता का उपदेश दिया।

2. निबंध में उल्लिखित महान व्यक्तियों ने अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज को एक नई दिशा दिखाई। हमारे आस-पास और भी ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं जो स्त्री-शिक्षा, पर्यावरण, असमानता, विशेष आवश्यकता समूह (दिव्यांगजन) आदि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं के विषय में पता लगाइए और लिखिए।

उत्तरः आज भी समाज में अनेक व्यक्ति और संस्थाएँ विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय कार्य कर रही हैं-

स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के माध्यम से बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कई NGOs ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों को शिक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में चिपको आंदोलन ने पेड़ों की रक्षा का संदेश दिया। आज भी स्वच्छ भारत अभियान और वन-महोत्सव जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से वृक्षारोपण, स्वच्छता और प्रदूषण नियंत्रण पर कार्य किया जा रहा है।

दिव्यांगजन के लिए कार्य दिव्यांग सशक्तिकरण विभाग तथा अन्य संस्थाएँ दिव्यांगजनों को शिक्षा, रोजगार और समान अवसर प्रदान करने के लिए प्रयासरत हैं।

असमानता के विरुद्ध कार्य प्रथम जैसी संस्थाएँ गरीब बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराती हैं। कई संगठन सामाजिक समानता और मानवाधिकारों के लिए कार्य कर रहे हैं।

3. आपको 'समाज-सुधार' करने का अवसर मिले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहेंगे और कैसे करना चाहेंगे? लिखिए।

उत्तरः यदि मुमुझे समाज-सुधार का अवसर मिले, तो मैं निम्नलिखित कार्य करना चाहूँगा/चाहूँगी-

मैं क्या-क्या सुधार करना चाहूँगा /चाहूँगी?

  • शिक्षा का प्रसार - सभी बच्चों, विशेषकर गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना।
  • स्त्री-पुरुष समानता- समाज में लड़का-लड़की के बीच भेदभाव को समाप्त करना।
  • पर्यावरण संरक्षण - पेड़ लगाना, प्रदूषण कम करना और स्वच्छता बनाए रखना।
  • दिव्यांगजनों के लिए सुविधाएँ उन्हें समान अवसर और आवश्यक सहायता देना। -
  • अंधविश्वास और कुरीतियों का विरोध लोगों में जागरूकता फैलाना।

मैं यह सुधार कैसे करूँगा /करूँगी?

  • लोगों में जागरूकता अभियान चलाकर
  • शिक्षा और सामाजिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी लेकर
  • स्वयं अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करके
  • सरकार और संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करके  

4. भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।

उत्तरः भारतीय ज्ञान-साहित्य में नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन के बीच संतुलन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। हमारे ग्रंथों में यह बताया गया है कि जीवन तभी सफल और सुखमय बनता है, जब इन तीनों पक्षों का समन्वय हो।

नैतिक जीवन (Moral Life): नैतिक जीवन का अर्थ है- सत्य बोलना, ईमानदारी, करुणा, अहिंसा और दूसरों के प्रति सम्मान रखना। यह हमारे चरित्र को मजबूत बनाता है और समाज में विश्वास पैदा करता है।

आध्यात्मिक जीवन (Spiritual Life) आध्यात्मिक जीवन हमें आत्मचिंतन, ध्यान, और ईश्वर-भक्ति की

ओर प्रेरित करता है। इससे मन को शांति मिलती है और हम सही-गलत का निर्णय बेहतर ढंग से कर पाते हैं। इसका सुंदर उदाहरण भगवद्गीता में मिलता है, जहाँ कर्म, भक्ति और ज्ञान का संतुलन बताया गया है।

व्यावहारिक जीवन (Practical Life): व्यावहारिक जीवन का संबंध हमारे दैनिक कार्यों, जिम्मेदारियों और सामाजिक व्यवहार से है। इसमें हमें परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में अपने कर्तव्यों का पालन करना होता है।

संतुलन का महत्व :- यदि केवल आध्यात्मिकता पर ध्यान दिया जाए और व्यवहारिक जीवन को नजरअंदाज किया जाए, तो जीवन अधूरा रह जाता है। इसी प्रकार, केवल भौतिक जीवन जीने से भी मन में शांति नहीं मिलती। इसलिए इन तीनों का संतुलन आवश्यक है।

सृजन

1. "दूर के ढोल सुहावने होते हैं" एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है।

आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी "आम के आम गुठलियों के दाम।" अब आप इस लोकोक्ति और "जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास" विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।

उत्तरः लोकोक्ति आधारित संक्षिप्त लेख

विषयः "आम के आम, गुठलियों के दाम" और "जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास"

"आम के आम, गुठलियों के दाम" लोकोक्ति का अर्थ है- एक ही कार्य से अनेक लाभ प्राप्त होना। यह बात जैविक खाद बनाने के प्रयास पर पूरी तरह लागू होती है।

आज के समय में हम घर के कचरे, जैसे फल-सब्जियों के छिलके, पत्तियाँ आदि को फेंक देते हैं, जिससे गंदगी और प्रदूषण बढ़ता है। यदि इन्हीं अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग करके हम जैविक खाद बनाते हैं, तो इससे दोहरा लाभ होता है। एक ओर कचरे का सही उपयोग हो जाता है और पर्यावरण स्वच्छ रहता है, वहीं दूसरी ओर हमें पौधों के लिए उपयोगी और प्राकृतिक खाद मिलती है।

इस प्रकार, जैविक खाद का निर्माण वास्तव में "आम के आम, गुठलियों के दाम" की कहावत को चरितार्थ करता है, क्योंकि इससे पर्यावरण संरक्षण और खेती- दोनों में लाभ मिलता है।

2. "जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।"

आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न होता है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।

उत्तरः डायरी लेखन (अनुभव आधारित)

दिनांक: 12 जुलाई 20XX

आज मुझे एक महत्वपूर्ण अनुभव हुआ। पहले मैं सोचता / सोचती था कि शहर का एक बड़ा विद्यालय बहुत ही शानदार और आदर्श होगा। दूर से उसकी बड़ी इमारत और नाम देखकर मुझे लगा कि वहाँ पढ़ाई का स्तर बहुत ऊँचा होगा।

लेकिन जब मुझे उस विद्यालय को पास से देखने का अवसर मिला, तो मेरा अनुभव बिल्कुल अलग था। वहाँ न तो अनुशासन ठीक था और न ही छात्रों और शिक्षकों के बीच अच्छा संवाद था। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जो चीज़ दूर से बहुत अच्छी लगती है, वह पास से वैसी नहीं होती।

इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि हमें किसी भी वस्तु या व्यक्ति के बारे में केवल बाहरी रूप देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। "दूर के ढोल सुहावने होते हैं" यह कहावत बिल्कुल सही है।


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💬 आपको "क्या लिखूँ" पाठ का कौन-सा विचार सबसे रोचक लगा – "दूर के ढोल सुहावने होते हैं" या "समाज-सुधार"? अपना उत्तर कमेंट में लिखिए।






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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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