कक्षा - 4
विषय: हिंदी
पुस्तक का नाम: कलख
पाठ संख्या: 1
पाठ का नाम - मातृभूमि का गौरव-गान
🚨 रुकिए… एक सवाल!
क्या आपने कभी सोचा है…
जिस धरती पर आपने जन्म लिया…
उसके लिए आपने आखिरी बार कब “धन्यवाद” कहा था?
यही सोच इस कविता की शुरुआत है… 👇
पाठ परिचय
हमारा भारत देश सिर्फ एक जगह नहीं है…
यह इतिहास है…
यह त्याग है…
यह महान लोगों की कहानी है…
इस कविता में हम अपनी मातृभूमि की महानता को महसूस करते हैं —
न सिर्फ पढ़ते हैं, बल्कि जीते हैं।
📜 कविता: मातृभूमि का गौरव-गान
जन्म लिया है जिस भू पर,
आओ करें उसका गुणगान।
मातृभूमि को नमन करें,
और गाएं इसके गौरव गान।
भूमि नहीं मात्र है यह,
है वीर शहीदों की जननी।
शिवा और प्रताप के तप की,
गावन भूमि रही अपनी।
अमृत वाणी सुना गए हैं,
नानक, बुद्ध, रहीम, कबीर।
कर्मपथ पर डटे रहो तुम,
जैसे रहे राम रणधीर।
वेद, पुराण, उपनिषद, गीता,
ज्ञान-समुद्र भरा इनमें।
ऋषि-मुनियों के सुंदर वचन,
है इस धरती के कण-कण में।
रज-कण को माथे पर मलकर,
सदा बढ़ाएं इसका मान।
बहती जिस में पावन गंगा,
आओ गाएं उसका गान।
— ए. के. मिश्र
⚡ एक छोटा सा ठहराव… सोचिए
यह सिर्फ कविता नहीं है।
यह याद दिलाती है कि—
👉 हम किस मिट्टी से बने हैं
👉 किन महान लोगों की विरासत हैं
👉 और हमें कैसा इंसान बनना है
🌿 निष्कर्ष (Payoff 🎯)
अगर इस कविता से एक बात याद रखनी हो, तो वो ये है:
देश सिर्फ नक्शे पर बनी रेखा नहीं होता…
देश हमारी पहचान होता है।
जब हम अपने देश का सम्मान करते हैं—
तभी हम सच में खुद का सम्मान करते हैं।
तो आज से…
छोटे-छोटे कामों से ही सही—
अपने भारत का मान बढ़ाएं ❤️
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